Who was Surat Singh Khalsa? Went on hunger strike for 8 years for the release of Sikh prisoners, Died in America
सिख समुदाय के लिए संघर्ष का प्रतीक रहे सूरत सिंह खालसा का 91 वर्ष की आयु में अमेरिका में निधन हो गया। अपने जीवनकाल में उन्होंने बंदी सिखों की रिहाई के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया। यह दुखद समाचार सिख समुदाय के लिए एक बड़ी क्षति है।
बंदी कैदियों की रिहाई के लिए संघर्ष
बापू सूरत सिंह खालसा ने न केवल सिख कैदियों की रिहाई की मांग की बल्कि सभी धर्मों के उन कैदियों की भी बिना शर्त रिहाई की वकालत की, जिन्होंने अपनी सजा पूरी कर ली थी। उनकी यह पहल मानवाधिकारों के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

बापू सूरत सिंह खालसा: एक परिचय
बापू सूरत सिंह खालसा सिख समुदाय के एक प्रमुख कार्यकर्ता थे, जिन्होंने अपने संघर्ष और बलिदान के माध्यम से बंदी सिखों की रिहाई के लिए एक मिसाल कायम की।
उन्होंने 16 जनवरी 2015 को, 82 वर्ष की आयु में, भूख हड़ताल शुरू की। यह आंदोलन 8 वर्षों तक चला और 14 जनवरी 2023 को समाप्त हुआ। उन्होंने यह संघर्ष लुधियाना जिले के हसनपुर गांव में अपने घर से शुरू किया।
भूख हड़ताल के दौरान संघर्ष और बलिदान
अपने आमरण अनशन के दौरान, उन्हें नाक के माध्यम से भोजन दिया जाता था। हालांकि उनका शरीर कमजोर हो गया था, लेकिन उनकी इच्छाशक्ति और दृढ़ता ने उन्हें कभी टूटने नहीं दिया। इस संघर्ष के दौरान, उन्होंने अधिकतर समय लुधियाना के दयानंद मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (DMCH) में बिताया।

मानवाधिकारों की अलख जगाई
बंदी सिंहों की रिहाई के लिए बापू सूरत सिंह खालसा का संघर्ष सिख समुदाय के लिए एक प्रेरणा है। उनकी मांगें न केवल सिख धर्म से जुड़ी थीं, बल्कि उन्होंने हर धर्म और जाति के उन कैदियों के अधिकारों की भी आवाज उठाई, जो अन्यायपूर्ण रूप से जेलों में बंद थे।
विरासत और सम्मान
उनका बलिदान और संघर्ष सिख इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज रहेगा। बापू सूरत सिंह खालसा ने मानवाधिकारों और न्याय के लिए जो प्रयास किए, वे दुनिया भर में प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे। उनके निधन पर सिख समुदाय और अन्य सामाजिक संगठनों ने गहरा शोक व्यक्त किया है।
उनकी याद और उनके संघर्ष की कहानी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।