सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: हिरासत में लेने के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी, देरी पर गिरफ्तारी अवैध हो सकती है
सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत और गिरफ्तारी से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समयसीमा उसे हिरासत में लेने के साथ ही शुरू हो जाती है। यह अवधि औपचारिक रूप से गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के समय से नहीं गिनी जाएगी।
गुरुवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियां किसी व्यक्ति को पहले हिरासत में लेकर बाद में उसकी गिरफ्तारी दर्ज करके 24 घंटे की संवैधानिक समयसीमा से बच नहीं सकतीं। यह फैसला गिरफ्तारी की प्रक्रिया और हिरासत में लिए गए व्यक्ति के अधिकारों के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर वास्तविक रूप से रोक लगाए जाने यानी हिरासत में लिए जाने के समय से ही 24 घंटे की अवधि की गणना होगी। जांच एजेंसियों के लिए यह जरूरी है कि वे निर्धारित समय के भीतर आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करें।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल गिरफ्तारी की औपचारिक तारीख या समय दर्ज करके हिरासत की वास्तविक अवधि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मामला क्या था?
यह मामला त्रिपुरा के चार लोगों की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उन्हें पहले हिरासत में लिया गया और उनकी औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने में करीब 21 घंटे का अंतर रखा गया।
उनका कहना था कि हिरासत में लेने और गिरफ्तारी दर्ज करने के बीच के इस अंतर के कारण 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के संवैधानिक नियम का उल्लंघन हुआ।
मामले की सुनवाई जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने की।
हिरासत और गिरफ्तारी में क्या अंतर है?
हिरासत: जब पुलिस या जांच एजेंसी किसी व्यक्ति की स्वतंत्र आवाजाही पर रोक लगाकर उसे अपने नियंत्रण में रखती है, तो यह हिरासत की स्थिति हो सकती है।
औपचारिक गिरफ्तारी: जब कानून के तहत गिरफ्तारी की प्रक्रिया दर्ज की जाती है और व्यक्ति को गिरफ्तार किए जाने की औपचारिक जानकारी दी जाती है।
सुप्रीम कोर्ट की स्पष्टता के अनुसार, 24 घंटे की गणना केवल औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने के समय से नहीं, बल्कि वास्तविक हिरासत शुरू होने से होगी।
24 घंटे के नियम का क्या है कानूनी आधार?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा में लगने वाले आवश्यक समय को छोड़कर 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है।
इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति को बिना न्यायिक निगरानी के लंबे समय तक हिरासत में न रखा जाए।
क्या 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में रखने पर व्यक्ति को रिहा करना होगा?
यदि किसी व्यक्ति को संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना निर्धारित समय से अधिक हिरासत में रखा जाता है, तो उसकी हिरासत और गिरफ्तारी को अदालत में चुनौती दी जा सकती है। हालांकि, रिहाई का फैसला मामले के तथ्यों, लागू कानून और अदालत के आदेश पर निर्भर करेगा। हर मामले में देरी होते ही स्वतः रिहाई हो जाएगी, ऐसा मानना सही नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट की इस स्पष्टता से जांच एजेंसियों को हिरासत और गिरफ्तारी के समय का सही रिकॉर्ड रखने तथा संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करने की जिम्मेदारी और स्पष्ट होती है।
संपादकीय नोट: मूल खबर में फैसले के विस्तृत आदेश और रिहाई से संबंधित सटीक निर्देश उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए रिहाई को स्वतः लागू होने वाला परिणाम बताने के बजाय कानूनी प्रक्रिया के अधीन रखा गया है।

