Punjabi Doordarshan | विशेष रिपोर्ट
एबटाबाद (पाकिस्तान):
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों के धार्मिक स्थलों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के एबटाबाद शहर में स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा को कथित रूप से अवैध तरीके से बेच दिए जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि एक सरकारी अधिकारी ने भारी रिश्वत लेकर न केवल गुरुद्वारे की जमीन का सौदा कराया, बल्कि इमारत गिराने की अनुमति भी दे दी।
1 करोड़ पाकिस्तानी रुपये की रिश्वत का आरोप
मीडिया और सामाजिक संगठनों की रिपोर्टों के अनुसार, अल्पसंख्यक धार्मिक संपत्तियों की देखरेख करने वाले इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ETPB) से जुड़े एक अधिकारी ने लगभग 1 करोड़ पाकिस्तानी रुपये की रिश्वत लेकर इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे को एक स्थानीय व्यक्ति को सौंप दिया। इसके बाद गुरुद्वारे की इमारत को गिराने की मंजूरी भी दे दी गई।
बुटीक बनाने की तैयारी
बताया जा रहा है कि जमीन का नया मालिक यहां कपड़ों का बुटीक बनवाने की तैयारी कर रहा है। आरोप है कि यह संपत्ति उसकी दो पत्नियों के नाम पर ट्रांसफर कर दी गई है। जिस स्थान पर कभी सिखों की धार्मिक गतिविधियां होती थीं, वहां अब व्यावसायिक निर्माण की योजना बनाई जा रही है।
सिख समुदाय में रोष
पाकिस्तान में रहने वाले सिख समुदाय ने इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि संबंधित अधिकारी को तत्काल बर्खास्त किया जाए और गुरुद्वारा साहिब की ऐतिहासिक इमारत को संरक्षित किया जाए। समुदाय का आरोप है कि वर्षों तक गुरुद्वारा परिसर की दुकानों से किराया वसूला गया, लेकिन रखरखाव और मरम्मत पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
आज भी पहचान बरकरार
स्थानीय लोगों के अनुसार, जिस गली में यह गुरुद्वारा स्थित है, उसे आज भी “गुरुद्वारा गली” के नाम से जाना जाता है। मुख्य द्वार पर गुरुमुखी लिपि में ‘गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा’ और दीवान हॉल के बाहर धार्मिक पंक्तियां आज भी देखी जा सकती हैं, जो इसकी ऐतिहासिक पहचान को दर्शाती हैं।
गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा का ऐतिहासिक महत्व
- यह गुरुद्वारा 19वीं सदी में सिख शासनकाल के दौरान निर्मित बताया जाता है।
- इतिहासकारों के अनुसार, इसका निर्माण महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल (1818–1849) के बीच हुआ।
- एबटाबाद क्षेत्र सिख साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण सैन्य और प्रशासनिक केंद्र माना जाता था।
- देश के विभाजन के बाद सिख और हिंदू आबादी के पलायन से यह गुरुद्वारा धीरे-धीरे वीरान हो गया और समय के साथ जर्जर हालत में पहुंच गया।
अल्पसंख्यक विरासत पर सवाल
यह मामला एक बार फिर पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सिख संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो ऐसी ऐतिहासिक धरोहरें हमेशा के लिए समाप्त हो सकती हैं।

