मोहाली के सोहाना गांव की अनोखी होली: घरों-दुकानों पर लटकती हड्डियां, श्मशान की राख से जुड़ी 200 साल पुरानी परंपरा

Punjabi Doordarshan | विशेष रिपोर्ट

मोहाली:
जहां पूरे देश में होली रंग-गुलाल के साथ मनाई जाती है, वहीं मोहाली के पास स्थित सोहाना गांव में इस त्योहार से जुड़ी एक बेहद अनोखी और रहस्यमयी परंपरा देखने को मिलती है। बताया जाता है कि यहां करीब 200 साल पुरानी परंपरा के तहत होली के मौके पर श्मशान की राख और पशुओं की हड्डियों से जुड़े दृश्य दिखाई देते हैं।

घरों और दुकानों के बाहर लटकती हैं हड्डियां

स्थानीय लोगों के अनुसार, होली से एक रात पहले गांव की गलियों, बाजार और कई घरों-दुकानों के बाहर पशुओं की हड्डियां टंगी हुई मिलती हैं। सड़कों पर भी हड्डियां बिखरी दिखाई देती हैं।

ग्रामीण बताते हैं कि सुबह होने पर लोग खुद ही सफाई कर लेते हैं, लेकिन यह काम कौन करता है और किस उद्देश्य से किया जाता है, इसका स्पष्ट जवाब आज तक किसी के पास नहीं है।

श्मशान की राख से खेलने की परंपरा

बुजुर्गों के अनुसार, पहले गांव में लोग श्मशान से राख लाकर उसे छानते थे और होली के दिन एक-दूसरे पर डालते थे। कुछ शरारती तत्व नालियों की गंदगी तक इस्तेमाल कर लेते थे। धीरे-धीरे यह परंपरा गांव की पहचान बन गई।

कई तरह की मान्यताएं

इस परंपरा को लेकर गांव में अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं।

  • कुछ लोग मानते हैं कि इससे बुरी नजर और दुर्भाग्य दूर होता है
  • कुछ का कहना है कि पुराने समय में रंग महंगे होने के कारण राख से होली खेलने की परंपरा शुरू हुई।
  • वहीं कई ग्रामीण इसे व्यापार और समृद्धि से भी जोड़कर देखते हैं।

प्रशासन रहता है सतर्क

होली के दिन किसी भी तरह की अव्यवस्था से बचने के लिए पुलिस प्रशासन सतर्क रहता है। हालांकि पहले की तुलना में अब स्थिति काफी बदली है और इस परंपरा का दायरा सीमित हो गया है।

अब दो तरह से मनती है होली

स्थानीय लोगों का कहना है कि अब गांव में दो तरह से होली मनाई जाती है—

  1. पारंपरिक रंगों और गुलाल के साथ
  2. पुराने रिवाज के तहत राख से जुड़ी परंपरा

शहरीकरण से कम हुआ प्रभाव

सोहाना गांव अब नगर निगम के दायरे में आ चुका है। यहां आधुनिक मकान, शिक्षण संस्थान और विकसित बाजार मौजूद हैं। शहरीकरण के प्रभाव से इस परंपरा में काफी कमी आई है, लेकिन यह पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

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