अमृतसर: पंजाब की पहचान और खान-पान की समृद्ध परंपरा का प्रतीक माने जाने वाले अमृतसरी कुलचे को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग दिलाने की प्रक्रिया ने रफ्तार पकड़ ली है। पंजाब सरकार के फूड प्रोसेसिंग विभाग ने इस दिशा में आगे बढ़ते हुए 19 जून को अमृतसर में एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है।
जानकारी के अनुसार, यह बैठक दोपहर 12 बजे डिप्टी कमिश्नर कार्यालय, अमृतसर में आयोजित की जाएगी। इसमें जिला प्रशासन, फूड प्रोसेसिंग विभाग, खाद्य तकनीक विशेषज्ञों और प्रमुख कुलचा निर्माताओं के शामिल होने की संभावना है। बैठक का मुख्य उद्देश्य अमृतसरी कुलचे को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाना है।
क्यों जरूरी है GI टैग?
अमृतसरी कुलचा केवल एक लोकप्रिय व्यंजन नहीं, बल्कि पंजाब की सांस्कृतिक और पाक विरासत का अहम हिस्सा माना जाता है। हाल के वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में अमृतसरी कुलचे के नाम से कई उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, जिससे इसकी मूल पहचान और इससे जुड़े पारंपरिक कारीगरों के हित प्रभावित होने की चिंता बढ़ी है।
जीआई टैग मिलने से अमृतसरी कुलचे की भौगोलिक पहचान को कानूनी संरक्षण मिलेगा और यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि इस नाम का उपयोग निर्धारित मानकों और क्षेत्रीय पहचान के अनुरूप ही किया जाए।
क्या होता है GI टैग?
भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication-GI) भारत के जीआई अधिनियम, 1999 के तहत दिया जाने वाला एक कानूनी प्रमाणन है। यह ऐसे उत्पादों को प्रदान किया जाता है, जिनकी विशेष गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशिष्ट पहचान किसी खास क्षेत्र से जुड़ी होती है। GI टैग मिलने के बाद उस उत्पाद की प्रामाणिकता और क्षेत्रीय पहचान को संरक्षण मिलता है।
समिति गठन पर रहेगा फोकस
सूत्रों के अनुसार, इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए पंजाब स्टेट काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के फूड टेक्नोलॉजी विभाग, जिला प्रशासन और फूड प्रोसेसिंग विभाग के प्रतिनिधियों की एक समन्वय समिति गठित करने की योजना है।
इसके साथ ही अमृतसर के कुलचा निर्माताओं का एक संगठन बनाने पर भी चर्चा की जाएगी, ताकि जीआई टैग के लिए आवेदन प्रस्तुत करने हेतु एक पात्र संस्था तैयार की जा सके।
जिला प्रशासन ने अमृतसरी कुलचा बनाने वाले प्रमुख निर्माताओं से बैठक में भाग लेने की अपील की है। माना जा रहा है कि यदि यह पहल सफल होती है तो अमृतसरी कुलचे को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी, साथ ही इससे जुड़े कारीगरों और कारोबारियों को भी बड़ा लाभ पहुंच सकता है।

