पंजाब में घट रही जन्म दर, छोटे परिवारों का बढ़ा चलन; बुजुर्ग आबादी बढ़ने की आशंका
पंजाब में परिवारों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले जहां बड़े परिवार आम माने जाते थे, वहीं अब कम बच्चों वाले परिवारों का चलन बढ़ रहा है। कम होती प्रजनन दर और बढ़ती औसत उम्र राज्य के जनसांख्यिकीय भविष्य को लेकर नई चुनौतियों की ओर इशारा करती है।
EAC-PM की रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के वर्किंग पेपर ‘द घोस्ट ऑफ पॉपुलेशन पास्ट: हाउ पॉपुलेशन कंट्रोल पर्सिस्ट्स इन इंडिया’ में भारत और विभिन्न राज्यों की प्रजनन दर से जुड़े आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) 1.9 है, जबकि पंजाब में यह घटकर 1.4 रह गई है। यह 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से कम है। सामान्य तौर पर प्रतिस्थापन स्तर वह दर है, जिस पर लंबे समय में एक पीढ़ी अपनी संख्या को लगभग स्थिर रख सकती है।
करियर और विदेश जाने की प्राथमिकता का असर
पंजाब में परिवारों के छोटे होने के पीछे बदलती सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां भी अहम मानी जा रही हैं। युवाओं के लिए करियर, आर्थिक स्थिरता और बेहतर रोजगार के अवसर महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। इसके साथ ही शादी और बच्चे पैदा करने से जुड़े फैसले भी कई परिवार देर से ले रहे हैं।
विदेश में पढ़ाई और नौकरी के लिए जाने की प्रवृत्ति भी युवाओं की जीवनशैली और पारिवारिक योजनाओं को प्रभावित कर सकती है। इन बदलावों के बीच कम बच्चों वाला परिवार कई लोगों की प्राथमिकता बन रहा है।
पंजाब की आबादी की औसत उम्र ज्यादा
रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब की आबादी की मीडियन एज लगभग 35 वर्ष है, जबकि भारत में यह करीब 30 वर्ष बताई गई है। मीडियन एज किसी आबादी को उम्र के आधार पर दो बराबर हिस्सों में बांटने वाली मध्य आयु होती है।
कम प्रजनन दर और अपेक्षाकृत अधिक मीडियन एज से राज्य में आबादी के उम्रदराज होने की संभावना पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है। आने वाले समय में इसका असर कामकाजी उम्र के लोगों की उपलब्धता और बुजुर्गों की जरूरतों पर पड़ सकता है।
स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा पर बढ़ सकता है दबाव
अगर बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ता है, तो स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्थाओं की जरूरत भी बढ़ सकती है। ऐसे में राज्य के लिए भविष्य की स्वास्थ्य सुविधाओं और सामाजिक सहायता योजनाओं की तैयारी महत्वपूर्ण होगी।
पंजाब की तुलना में हरियाणा और हिमाचल की स्थिति
रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा की कुल प्रजनन दर 1.9 और हिमाचल प्रदेश की 1.5 है। वहीं पंजाब की दर 1.4 बताई गई है, जो इन दोनों राज्यों से कम है। दिल्ली में यह आंकड़ा 1.2 दर्ज किया गया है।
ये आंकड़े बताते हैं कि राज्यों के बीच प्रजनन दर में अंतर है और पंजाब में यह प्रतिस्थापन स्तर से काफी नीचे पहुंच चुकी है।
स्कूलों में दाखिलों पर भी पड़ सकता है असर
जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या लंबे समय तक कम बनी रहती है, तो आने वाले वर्षों में स्कूलों में दाखिलों पर इसका प्रभाव दिखाई दे सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों में विद्यार्थियों की संख्या घटने से स्कूलों के संसाधनों, शिक्षकों की जरूरत और संस्थानों की योजना पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, पंजाब में घटती प्रजनन दर और बढ़ती मीडियन एज ऐसे बदलाव हैं, जिन पर भविष्य की जनसंख्या नीति, शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं की योजना बनाते समय ध्यान देना जरूरी होगा।

