विवादित किताब पर नरवणे बोले- मैं आगे बढ़ चुका हूं, आवाज उठाना गुनाह नहीं; कसौली लिटफेस्ट में रखी राय
कसौली: पूर्व सेना प्रमुख रिटायर्ड जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने अपनी अप्रकाशित किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लेकर कहा है कि वह इस विवाद से आगे बढ़ चुके हैं। शुक्रवार को कसौली क्लब में शुरू हुए 15वें खुशवंत सिंह लिटफेस्ट में पहुंचे नरवणे ने कहा कि पुरानी बातों को पीछे छोड़कर आगे देखना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किताब अभी प्रकाशक के पास ही है।
कार्यक्रम के दौरान नरवणे ने विदेश नीति, देश में विरोध-प्रदर्शनों, अग्निपथ योजना और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जैसे मुद्दों पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि लोगों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए और विरोध के पीछे की वजहों को समझना जरूरी है। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि अपनी बात रखने का अधिकार होने का मतलब मनमानी करने की छूट नहीं है।
विवादित किताब पर बोले- मैं आगे बढ़ चुका हूं
‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लेकर सवाल पूछे जाने पर नरवणे ने विस्तार से टिप्पणी करने से परहेज किया। उन्होंने अपनी दूसरी पुस्तकों का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी पहली किताब ‘कैंटोनमेंट कॉन्स्पिरेसी’ पर पहले चर्चा हो चुकी है, जबकि दूसरी किताब के बारे में वह अपने सत्र में बात करेंगे।
किताब के प्रकाशन और प्रकाशक के जवाब से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा, “मैं आगे बढ़ चुका हूं।”
नरवणे की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब उनकी अप्रकाशित आत्मकथा को लेकर राजनीतिक विवाद भी सामने आया था। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस किताब के कथित अंशों का हवाला देते हुए 2020 में चीन के साथ सैन्य गतिरोध के दौरान सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए थे। इस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आपत्ति जताई थी कि अप्रकाशित किताब का हवाला नहीं दिया जा सकता।
विरोध-प्रदर्शनों पर समाज को बताया प्रेशर कुकर
देश में विरोध-प्रदर्शनों और बदलाव की मांगों पर चर्चा करते हुए नरवणे ने समाज की तुलना प्रेशर कुकर से की। उन्होंने समझाया कि यदि प्रेशर कुकर से भाप निकलने का रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया जाए, तो वह फट सकता है। इसी तरह समाज में लोगों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि विरोध-प्रदर्शनों के पीछे के कारणों को समझना और लोगों की बात सुनना जरूरी है। हालांकि, केवल सड़क पर प्रदर्शन करने से किसी मांग के तुरंत पूरा होने की गारंटी नहीं होती। इसके लिए कानूनी प्रक्रिया और उचित माध्यमों का इस्तेमाल करना भी आवश्यक है।
चीन के साथ प्रतिस्पर्धा, लेकिन बातचीत भी जरूरी
विदेश नीति पर अपनी राय रखते हुए नरवणे ने कहा कि भारत को पाकिस्तान और चीन समेत सभी देशों के साथ बातचीत की गुंजाइश बनाए रखनी चाहिए। उनके मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय संबंधों में प्रतिस्पर्धा और संवाद एक साथ चल सकते हैं।
उन्होंने कहा कि चीन के साथ भारत की प्रतिस्पर्धा व्यापार, अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक प्रभाव जैसे क्षेत्रों में है। हर परिस्थिति को दुश्मनी के नजरिए से देखना उचित नहीं है।
बदलते वैश्विक समीकरणों का जिक्र करते हुए नरवणे ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में देशों के स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते, बल्कि उनके हित स्थायी होते हैं। उन्होंने मुश्किल समय में साथ देने वाले देशों को याद रखने की जरूरत बताई और कहा कि एक पुराना दोस्त दो नए दोस्तों से बेहतर होता है।
पड़ोसी देशों में बदलाव के बीच भारत की प्रगति का जिक्र
नरवणे ने नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए भारत की आर्थिक प्रगति पर भी बात की। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन पर संतोष जताते हुए कहा, “मुझे लगता है, हम अच्छा काम कर रहे हैं।”
उनकी टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब क्षेत्रीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों में लगातार बदलाव देखने को मिल रहे हैं।
अग्निपथ योजना में सुधार तथ्यों के आधार पर हो
अग्निपथ योजना की समीक्षा और उसमें संभावित बदलावों पर नरवणे ने कहा कि कोई भी नीति पूरी तरह सही नहीं होती। जरूरत पड़ने पर उसमें सुधार किया जा सकता है, लेकिन फैसले भावनाओं या दबाव के बजाय तथ्यों, आंकड़ों और फील्ड से मिलने वाले फीडबैक के आधार पर होने चाहिए।
उन्होंने संविधान में समय-समय पर किए गए संशोधनों का उदाहरण देते हुए कहा कि नीतियों में भी आवश्यकतानुसार बदलाव की गुंजाइश होनी चाहिए।
सेना रहेगी अराजनीतिक, सैनिकों को वोट देने का अधिकार
सेना और राजनीति के संबंधों पर नरवणे ने स्पष्ट किया कि सेना एक संगठन के रूप में अराजनीतिक है और उसे आगे भी ऐसा ही रहना चाहिए।
हालांकि, उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत स्तर पर हर सैनिक को अपने राजनीतिक विचार रखने और मतदान करने का अधिकार है। सेना में अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय पृष्ठभूमि से लोग आते हैं तथा संगठन के भीतर सभी के साथ समान व्यवहार किया जाता है।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए R&D पर जोर
रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता के मुद्दे पर नरवणे ने कहा कि भारत ने स्वदेशी निर्माण के क्षेत्र में प्रगति की है, लेकिन कई रक्षा उपकरणों और तकनीकों के लिए अब भी आयात पर निर्भरता बनी हुई है।
उन्होंने अनुसंधान एवं विकास यानी रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में अधिक निवेश और ध्यान देने की जरूरत पर जोर दिया। उनके मुताबिक, रक्षा क्षेत्र में वास्तविक आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए स्वदेशी तकनीक विकसित करने पर अधिक काम करना होगा।
राहुल गांधी ने संसद में उठाया था किताब का मुद्दा
‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लेकर विवाद उस समय बढ़ा, जब राहुल गांधी ने संसद में किताब में बताई गई घटनाओं का उल्लेख करने की कोशिश की। सरकार ने इस पर आपत्ति जताई, क्योंकि किताब को आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं किया गया था।
बाद में राहुल गांधी किताब की एक प्रति संसद में लेकर पहुंचे थे। इसके बाद किताब की कथित PDF कॉपी सोशल मीडिया पर प्रसारित होने लगी। रिपोर्ट के मुताबिक, डिजिटल और अन्य प्रारूपों में पांडुलिपि के कथित अनधिकृत प्रसार की जांच के लिए दिल्ली पुलिस ने FIR दर्ज की।
किताब की प्रकाशक पेंगुइन इंडिया ने बयान जारी कर कहा था कि किताब का जो भी हिस्सा प्रसारित हो रहा है, वह कॉपीराइट का उल्लंघन है। इसके बाद नरवणे ने प्रकाशक के रुख का समर्थन करते हुए कहा था कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है और न ही आम जनता के लिए उपलब्ध कराई गई है।
किताब में 2020 के भारत-चीन सैन्य गतिरोध का भी जिक्र
जनरल एमएम नरवणे 2019 से 2022 तक भारतीय सेना के प्रमुख रहे। उनकी आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ में उनके सैन्य करियर के साथ 2020 के भारत-चीन सीमा विवाद, गलवान घाटी की घटनाओं, अग्निपथ योजना और रणनीतिक फैसलों से जुड़े विषयों का उल्लेख बताया गया है।
रिपोर्टों में किताब के कथित अंशों के हवाले से दावा किया गया कि 31 अगस्त 2020 को पैंगोंग त्सो के दक्षिणी किनारे पर कैलाश रेंज में हुए घटनाक्रम के दौरान भारतीय सेना की प्रतिक्रिया को लेकर राजनीतिक निर्देशों का मुद्दा उठाया गया था। हालांकि, किताब के आधिकारिक रूप से प्रकाशित न होने के कारण उसके पूरे विवरण औरसंदर्भ की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है।

प्रकाशन की मंजूरी अब तक लंबित
किताब जनवरी 2024 में प्रकाशित होने वाली थी। दिसंबर 2023 में समाचार एजेंसी PTI ने इसके कुछ अंश प्रकाशित किए थे। अग्निवीर योजना से जुड़े कथित अंशों के सामने आने के बाद रक्षा मंत्रालय ने नरवणे और प्रकाशक से किताब को प्रकाशन से पहले मंजूरी के लिए प्रस्तुत करने को कहा था।
रिपोर्ट के मुताबिक, सेना ने किताब की समीक्षा कर अपनी टिप्पणियां दर्ज की थीं और अंतिम निर्णय के लिए इसे रक्षा मंत्रालय के पास भेज दिया था। मंत्रालय की मंजूरी नहीं मिलने के कारण पुस्तक का प्रकाशन लंबित बताया गया है।
इससे पहले नरवणे ने सोशल मीडिया पर किताब की उपलब्धता का उल्लेख करते हुए प्री-ऑर्डर लिंक भी साझा किया था। हालांकि, इसके बाद प्रकाशन की स्थिति को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
पूर्व अधिकारियों के लिए क्या हैं प्रकाशन संबंधी नियम?
केंद्रीय सिविल सेवा नियमों में किए गए संशोधनों के तहत संवेदनशील और सुरक्षा से जुड़ी जानकारी के प्रकाशन पर प्रतिबंध लागू हो सकते हैं। संबंधित पूर्व अधिकारियों को नियमों के अनुसार अपने मंत्रालय या संगठन से आवश्यक अनुमति लेनी पड़ सकती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मामलों में आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के प्रावधान भी लागू हो सकते हैं। ऐसे मामलों में किसी पुस्तक के प्रकाशन की अनुमति उसके विषय, उसमें शामिल जानकारी और लागू नियमों के आधार पर तय होती है।

